केवडिया (गुजरात), 31 अक्टूबर (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अपने तीन दिवसीय दौरे के दूसरे दिन सोमवार को कहा कि जब सब एक साथ मिलकर चलते हैं और एक साथ आगे बढ़ते हैं तो असंभव कार्य को भी संभव बनाया जा सकता है।
श्री मोदी ने एकता दिवस समारोह में आज कहा, "मैं वर्ष 2022 में राष्ट्रीय एकता दिवस काे बहुत विशेष अवसर के रूप में देख रहा हूं। ये वो वर्ष है जब हमने अपनी आजादी के 75 वर्ष पूरे किए हैं। हम नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। आज एकता नगर में ये जो परेड हुई है, हमें इस बात का अहसास भी दिला रही है कि जब सब एक साथ चलते हैं, एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।" उन्होंने कहा कि आज यहां देशभर से आए हुए कुछ कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करने वाले थे। भारत के विविध नृत्यों को भी प्रदर्शित करने वाले थे, लेकिन कल मोरबी की घटना इतनी दुख:द थी कि आज के इस कार्यक्रम में से उस कार्यक्रम को हटा दिया गया है।
उन्होंने कहा कि मैं उन सभी कलाकारों से उनका यहां तक आना, उन्होंने जो पिछले दिनों मेहनत की है, लेकिन आज उनको मौका नहीं मिला। मैं उनके दुख को समझ सकता हूं, लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं। ये एकजुटता, अनुशासन, परिवार, समाज, गाँव, राज्य और देश, हर स्तर पर आवश्यक है। इसके दर्शन आज हम देश के कोने-कोने में कर भी रहे हैं। आज देश भर में 75 हजार एकता दौड़ 'रन फोर यूनिटी' हो रही हैं, लाखों लोग जुड़ रहे हैं। देश का जन-जन लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की संकल्पशक्ति से प्रेरणा ले रहा है। आज देश का जन-जन अमृतकाल के 'पंच प्राणों'को जागृत करने के लिए राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए संकल्प ले रहा है।
राष्ट्रीय एकता दिवस ये अवसर केवड़िया-एकतानगर की ये धरती और स्टेचू ऑफ यूनिटी हमें निरंतर ये अहसास दिलाते हैं कि आज़ादी के समय अगर भारत के पास सरदार पटेल जैसा नेतृत्व न होता, तो क्या होता। क्या होता अगर साढ़े पांच सौ से ज्यादा रियासतें एकजुट नहीं हुई होतीं । क्या होता अगर हमारे ज्यादातर राजे-रजवाड़े त्याग की पराकाष्ठा नहीं दिखाते, मां भारती में आस्था नहीं दिखाते। आज हम जैसा भारत देख रहे हैं, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। ये कठिन कार्य, ये असंभव कार्य, सिर्फ और सिर्फ सरदार पटेल ने ही सिद्ध किया।
सरदार साहब की जन्मजयंती और 'राष्ट्रीय एकता दिवस' ये हमारे लिए केवल तारीख भर नहीं हैं। ये भारत के सांस्कृतिक सामर्थ्य का एक महापर्व भी है। भारत के लिए एकता कभी भी विवशता नहीं रही है। भारत के लिए एकता सदा-सर्वदा विशेषता रही है। एकता हमारी विशिष्टता रही है। एकता की भावना भारत के मानस में, हमारे अन्तर्मन में कितनी रची बसी है, हमें अपनी इस खूबी का अक्सर अहसास नहीं होता है, कभी-कभी ओझल हो जाती है। लेकिन आप देखिए, जब भी देश पर कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाता है।
आपदा उत्तर में हो या दक्षिण में, पूरब में या पश्चिमी हिस्से में, ये मायने नहीं रखती है। पूरा भारत एकजुट होकर सेवा, सहयोग और संवेदना के साथ खड़ा हो जाता है। कल ही देख लीजिए मोरबी में हादसा हुआ, उसके बाद हर एक देशवासी, हादसे का शिकार हुए लोगों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रहा है। स्थानीय लोग हादसे की जगह पर, अस्पतालों में, हर संभव मदद के लिए खुद आगे आ रहे थे। यही तो एकजुटता की ताकत है।
कोरोना का इतना बड़ा उदाहरण भी हमारे सामने है। ताली-थाली की भावनात्मक एकजुटता से लेकर राशन, दवाई और वैक्सीन के सहयोग तक, देश एक परिवार की तरह आगे बढ़ा। सीमा पर या सीमा के पार, जब भारत की सेना शौर्य दिखाती है, तो पूरे देश में एक जैसे जज़्बात होते हैं, एक जैसा जज़्बा होता है। जब ओलंपिक्स में भारत के युवा तिरंगे की शान बढ़ाते हैं, तो पूरे देश में एक जैसा जश्न मनता है। जब देश क्रिकेट का मैच जीतता है, तो देश में एक जैसा जुनून होता है। हमारे जश्न के सांस्कृतिक तौर-तरीके अलग-अलग होते हैं, लेकिन भावना एक जैसी ही होती है। देश की ये एकता, ये एकजुटता, एक-दूसरे के लिए ये अपनापन ये बताता है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत की जड़ें कितनी गहरी हैं।
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